Wednesday, 9 November 2016

आस्तिकता का सही अर्थ क्या हैं




आर्य समाज सर्वत्र व्याप्त निराकार एवं सर्वहितकारी ईश्वर में आस्था रखता है और उसी की उपासना का शास्त्र सम्मत मार्ग बताता है । वह मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करता है। उसकी दृष्टि में परमात्मा अवतार नहीं लेता है । वह जन्म मरण के बन्धन से मुक्त है । वह कण कण में सर्वत्र विद्यमान है । ज्ञान की आँखों से उसकी अनुभूति होती हैं । जीवात्मा से उसका सीधा संबंध है इस विचारधारा का एकेश्वरवाद महत्वपूर्ण विशेषता है ।

ईश्वर की अनुभूति करने के. यम, नियम, साधना, योगाभ्यास आदि आधार वैज्ञानिक, व्यावहारिक एवं जीवनोपयोगी है । परमेश्वर विषयक ऐसा सीधा व सार्थक दृष्टिकोण अन्यत्र दुर्लभ है ।

एक परमात्मा को मानने से अनेक विवाद, समस्याएँ तथा सम्प्रदायों के झगड़े स्वतः समाप्त हो जाते है। यह चित्र विचित्र सृष्टि बनाने वाले प्रभु का संकेत कर रही है । वह जगदीश्वर अपने कर्मों द्वारा सर्वत्र प्रगट हो रहा हैं । वह तो अनुभव का विषय है । जब ह्रदय निर्मल और सात्विक अवस्था में होता है तब उसकी ह्रदय मन्दिर में अनुभूति होती हैं।

आज ये सारा संसार परमेश्वर को बाहर की दुनिया में खोज रहा है । यही भूल हो रही है वैदिक धर्म प्रभु का सच्चा व सीधा रास्ता बताता है।

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